बाड़मेर की रेतीली सरज़मीं से उठकर आसमान की बुलंदियों तक पहुंचने वाली गरिमा चौधरी की कहानी किसी अफसाने से कम नहीं। यह वही धरती है जहाँ के वीरों ने इतिहास रचा है और अब गरिमा ने अपनी मेहनत, जज़्बे और हौसले से एक नया मुकाम हासिल किया है। उनके संघर्ष, लगन और परिश्रम की यह कहानी हर उस लड़की के लिए एक मिसाल है जो खुद को सीमित दायरों से बाहर निकाल कर नई बुलंदियों को छूना चाहती है। गरिमा चौधरी की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों, मेहनत और लगन हो तो कोई भी बाधा आपकी मंज़िल तक पहुंचने से रोक नहीं सकती। उनका यह सफर संघर्ष मेहनत और कामयाबी की अनूठी मिसाल है। इस लेख में हम गरिमा की ज़िंदगी, उनके संघर्ष एविएशन की दुनिया में उनके सफर और उनकी प्रेरणादायक यात्रा को विस्तार से जानेंगे। इसके साथ ही हम pilot garima chaudhary के बारे में भी चर्चा करेंगे।

परिचय एवं प्रारंभिक जीवन
बाड़मेर के किसान परिवार की बेटी गरिमा चौधरी का जन्म बाबा रामदेव की जन्मस्थली कश्मीर (शिव) में हुआ। उन्होंने विद्यालयी शिक्षा टी.टी. पब्लिक स्कूल, बाड़मेर तथा केंद्रीय विद्यालय, जालिपा, बाड़मेर से प्राप्त की। उनके पिता श्री खींया राम सारण बाड़मेर में एक मेडिकल स्टोर का संचालन करते हैं तथा माता श्रीमती कमला चौधरी गृहिणी हैं। वे शिव से पूर्व प्रधान (2000–2005) भी रह चुकी हैं।
गरिमा के परिवार में तीन बहनें हैं। बड़ी बहन गीता डॉक्टर हैं तथा छोटी बहन लक्षिता विद्यालयी शिक्षा में अध्ययनरत हैं। गरिमा की परवरिश सादगीपूर्ण वातावरण में हुई, लेकिन उनके सपनों की उड़ान हमेशा बुलंद रही।
कहते हैं कि बेटियाँ बेटों से कम नहीं होतीं—इस बात को कश्मीर निवासी श्री खींया राम सारण ने सच साबित किया। उन्होंने कभी भी अपनी बेटी के सपनों को छोटा नहीं समझा, बल्कि हमेशा उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हालांकि यह रास्ता आसान नहीं था। एक मध्यमवर्गीय परिवार में रहते हुए एविएशन जैसे महंगे कोर्स के लिए पढ़ाई करना सरल नहीं था, लेकिन गरिमा के माता-पिता ने हर संभव प्रयास किया कि उनकी बेटी को बेहतरीन शिक्षा मिले।
सपना बना जुनून
गरिमा चौधरी का कहना है कि विद्यालयी शिक्षा के दौरान जब वे आसमान में हवाई जहाज़ को उड़ते हुए देखती थीं, तो उनके मन में यह विचार आता था कि काश, एक दिन वे भी उसी जहाज़ को चला पाएं। यही सपना आगे चलकर उनका जुनून बन गया।
चुनौतियों से संघर्ष
पायलट बनना किसी भी आम छात्र के लिए आसान नहीं होता, खासकर तब जब आप एक छोटे से गाँव से आते हों और आपके पास सीमित संसाधन हों। गरिमा चौधरी के सामने भी कई मुश्किलें थीं—
आर्थिक समस्याएँ — एविएशन ट्रेनिंग बेहद महंगी होती है। पायलट बनने के लिए लाखों रुपये फीस के रूप में खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में किसान परिवार से होने के कारण यह उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी।
सामाजिक बाधाएँ — छोटे से गाँव में लड़कियों को पारंपरिक करियर विकल्पों तक सीमित रखा जाता है। ऐसे में गरिमा के लिए पायलट बनने का सपना समाज के कुछ लोगों को अजीब लगा।
संसाधनों की कमी — बाड़मेर जैसे शहर में उच्चस्तरीय शिक्षा और एविएशन से संबंधित सुविधाएँ बहुत कम थीं, जिसके कारण गरिमा को आगे की पढ़ाई के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ा।
लेकिन गरिमा ने इन सभी बाधाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने कड़ी मेहनत की, पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन किया और आखिरकार अपने सपने की ओर कदम बढ़ाया।

एविएशन की दुनिया में प्रवेश
गरिमा चौधरी ने एविएशन इंडस्ट्री में कदम रखने के लिए कड़ी मेहनत की। वर्ष 2019 में वे पायलट ट्रेनिंग के लिए गईं, लेकिन कुछ ही दिनों बाद कोविड-19 महामारी आ गई, जिसके कारण ट्रेनिंग अकादमी लगभग दो वर्षों तक बंद रही। इसके बाद 2021 में उन्होंने पुणे की रेड बर्ड फ्लाइंग अकादमी से अपनी ट्रेनिंग पूरी की तथा एयरबस-320 का प्रशिक्षण लांबिया में पूर्ण किया।
यह सफर बेहद कठिन था, क्योंकि एविएशन से जुड़े कोर्स में न केवल पढ़ाई कठिन होती है, बल्कि शारीरिक और मानसिक रूप से भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। अपनी ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने विभिन्न प्रकार के विमानों को उड़ाने का अनुभव प्राप्त किया और एविएशन इंडस्ट्री में अपना नाम बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत की।
आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें देश की प्रतिष्ठित इंडिगो एयरलाइंस में जूनियर फर्स्ट ऑफिसर (पायलट) के रूप में चयनित कर लिया गया। यह क्षण न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे बाड़मेर जिले के लिए भी गर्व का विषय बन गया।
पिता श्री खींया राम सारण कहते हैं—
“मुझे बहुत खुशी है कि मेरी बेटी अब हवाई जहाज़ उड़ाएगी। गरिमा शुरू से ही बहुत सक्रिय और मेहनती रही है। चाहे परीक्षा हो या ट्रेनिंग, वह हर समय मजबूत रहकर अपने लक्ष्य तक पहुँची है।”
समाज के लिए प्रेरणा
गरिमा चौधरी की इस उपलब्धि ने न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे राजस्थान और देश के लिए गर्व का अवसर प्रदान किया है। उनकी सफलता ने कई अन्य लड़कियों को भी यह प्रेरणा दी है कि वे अपने सपनों को साकार करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। आज वे युवाओं, विशेषकर लड़कियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं।
उनके संघर्ष और मेहनत की कहानी यह संदेश देती है कि संसाधनों की कमी आपको सफलता से नहीं रोक सकती, यदि आपके पास मेहनत और लगन हो। वे अब चाहती हैं कि बाड़मेर और राजस्थान के अन्य क्षेत्रों की लड़कियाँ भी एविएशन इंडस्ट्री में आगे आएँ। इसके लिए वे विभिन्न कार्यक्रमों और सेमिनारों में भाग लेकर लड़कियों को जागरूक कर रही हैं।
गरिमा चौधरी का मानना है—
“छोटे गाँव की बेटियाँ भी बड़े सपने देख सकती हैं और उन्हें पूरा कर सकती हैं। अगर आप अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं, तो कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती। सपने देखने से ज्यादा ज़रूरी है उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करना। अगर आप मेहनत करेंगे, तो सफलता आपके कदम चूमेगी।”
